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जैतहरी में शासकीय संपत्ति पर कथित अवैध कब्जे से लेकर दो मंजिला भवन और पांच बिजली कनेक्शनों तक सवालों के घेरे में जिम्मेदार अधिकारी

हाईकोर्ट में प्रकरण लंबित होने, केंद्रीय मंत्री के पत्र और प्रशासन को लिखित शिकायतें दिए जाने के बावजूद कार्रवाई पर उठे सवाल; आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा कथित भ्रष्टाचार?

जैतहरी, जिला अनूपपुर (मध्य प्रदेश) –

नगर परिषद जैतहरी में शासकीय संपत्ति की सुरक्षा, राजस्व भूमि के कथित अवैध क्रय-विक्रय, सरकारी जमीन पर दो मंजिला भवन निर्माण, बिना वैध दस्तावेजों के पांच विद्युत कनेक्शन जारी होने तथा भवन को किराये पर संचालित किए जाने से जुड़े गंभीर आरोपों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित विभागों को बार-बार लिखित सूचना देने के बावजूद अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप अभिलेखों से प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि शासकीय संपत्ति की सुरक्षा और विभिन्न विभागों की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासकीय भूमि पर कथित अवैध कब्जे, निर्माण और बिजली कनेक्शनों के संबंध में शिकायतें की जा चुकी हैं, तब शहरी विकास विभाग, नजूल विभाग और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी क्या कार्रवाई कर रहे हैं? क्या इन अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया? क्या भूमि के स्वामित्व और निर्माण की वैधानिकता की जांच की गई? और यदि जांच हुई, तो उसकी रिपोर्ट तथा कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?

शासकीय भूमि पर कथित कब्जा, दो मंजिला भवन और किराये से कमाई का आरोप –

शिकायतकर्ता के अनुसार, नगर परिषद जैतहरी के वार्ड क्रमांक 5 में मध्य प्रदेश शासन की भूमि पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर दो मंजिला भवन का निर्माण किया गया है। आरोप है कि भवन को किराये पर देकर आर्थिक लाभ भी प्राप्त किया जा रहा है। इस मामले में भूमि के स्वामित्व, कब्जे की स्थिति, भवन निर्माण की अनुमति तथा संबंधित निकाय से जारी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

यदि भूमि वास्तव में शासकीय है और संबंधित व्यक्ति के पक्ष में कोई वैध पट्टा, आवंटन अथवा अन्य कानूनी अधिकार उपलब्ध नहीं है, तो यह जांच का विषय है कि सरकारी भूमि पर निर्माण कैसे हुआ और संबंधित विभागों ने समय रहते रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए।

शिकायतकर्ता का कहना है कि इस संबंध में पहले भी शिकायतें और सूचनाएं दी गईं, लेकिन ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दी। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या संबंधित अधिकारियों ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया अथवा मामले को लंबित रखकर कथित अतिक्रमण को बढ़ने दिया?

बिना वैध दस्तावेजों के पांच विद्युत कनेक्शन कैसे जारी हुए?

इस प्रकरण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भवन में कथित रूप से जारी किए गए पांच विद्युत कनेक्शन हैं। शिकायतकर्ता के पूर्व कथन के अनुसार, सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में कनेक्शन जारी करने से संबंधित दस्तावेजों और उपभोक्ता अनुबंध पत्रों की उपलब्धता को लेकर सवाल सामने आए थे। यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ दस्तावेज कनेक्शन जारी होने के बाद प्राप्त किए गए।

यदि संबंधित अभिलेखों में वास्तव में आवश्यक दस्तावेजों का अभाव है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि कनेक्शन जारी करने से पहले किन दस्तावेजों का सत्यापन किया गया, आवेदन किस अधिकारी ने स्वीकृत किए और कनेक्शन देने के लिए कौन-से नियम लागू किए गए।

शिकायतकर्ता के पूर्व विवरण के अनुसार, विद्युत विभाग के कार्यपालन अभियंता ने शिकायत की जांच के बाद पांचों कनेक्शनों को स्थायी रूप से विच्छेदित करने का आदेश दिया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि आदेश के बावजूद जिम्मेदार कर्मचारियों द्वारा उसका प्रभावी पालन नहीं किया गया।

इस संबंध में विद्युत विभाग को आदेश की प्रमाणित प्रति, आदेश की तारीख, अनुपालन रिपोर्ट और वर्तमान कनेक्शन स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि विच्छेदन आदेश जारी हुआ है, तो उसके पालन में देरी के कारणों की भी जांच होनी चाहिए।

मुख्य सवाल: जब किसी भवन की भूमि और निर्माण की वैधानिकता पर आपत्ति दर्ज हो चुकी थी, तब विद्युत कनेक्शन जारी करने की प्रक्रिया में किन तथ्यों और दस्तावेजों को आधार बनाया गया? इसका उत्तर संबंधित विद्युत अधिकारियों और अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकता है।

हाईकोर्ट में WP 04373/2024 का हवाला, फिर भी जांच क्यों नहीं?

शिकायतकर्ता ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर खंडपीठ में प्रकरण क्रमांक WP 04373/2024 का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि इस मामले में नोटिस जारी होने के बावजूद संबंधित विषय पर प्रभावी वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई और जांच भी शुरू नहीं की गई।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है। न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किया जाना अपने आप में आरोपों को प्रमाणित नहीं करता और न ही प्रत्येक स्थिति में किसी अधिकारी को दोषी सिद्ध करता है। हालांकि, यदि प्रकरण में संबंधित अधिकारियों को जवाब देने या कोई कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है, तो उस आदेश का पालन और जवाब दाखिल करने की स्थिति अभिलेखों के आधार पर स्पष्ट की जानी चाहिए।

इसलिए संबंधित प्रकरण के आदेश, नोटिस, पक्षकारों के जवाब और बाद के आदेशों की प्रमाणित प्रतियों का परीक्षण आवश्यक है। यदि न्यायालय ने कोई विशिष्ट निर्देश दिया है और उसका पालन नहीं हुआ है, तो शिकायतकर्ता विधिसम्मत प्रक्रिया के माध्यम से इस तथ्य को न्यायालय के संज्ञान में ला सकता है।

अब सवाल यह है कि संबंधित अधिकारियों ने न्यायालयीन कार्यवाही के संदर्भ में क्या जवाब प्रस्तुत किया और शासकीय भूमि की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए?

केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के पत्र और कलेक्टर को दी गई सूचना के बाद भी भूमि की बिक्री का आरोप –

शिकायतकर्ता के अनुसार, केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले द्वारा जारी पत्र के बाद जिला अनूपपुर के तत्कालीन कलेक्टर रत्नाकर झा के स्तर पर जांच संबंधी पत्राचार हुआ था। इसके बावजूद आरोप है कि विवादित शासकीय भूमि को कथित रूप से सक्रिय बिचौलियों के माध्यम से बेच दिया गया।

शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित भूमि के संबंध में पहले से प्रशासन को जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद कथित बिक्री और कब्जे की स्थिति उत्पन्न होना प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

हालांकि, इस मामले में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि केंद्रीय मंत्री के पत्र में क्या निर्देश थे, कलेक्टर कार्यालय ने किस अधिकारी को जांच सौंपी थी, जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकाले गए और भूमि की बिक्री के संबंध में राजस्व अभिलेखों में वास्तव में क्या दर्ज है।

यदि जांच लंबित रहते हुए शासकीय भूमि के हस्तांतरण या निजी उपयोग की स्थिति बनी है, तो संबंधित दस्तावेजों और आदेशों की जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

तिजिया बाई, संतोष सोनी और कथित भूमि बिक्री की जांच की मांग –

शिकायतकर्ता ने तिजिया बाई, निवासी जैतहरी, तथा संतोष सोनी की भूमिका को लेकर भी आरोप लगाए हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, तहसीलदार जैतहरी शशांक सिंडे के आदेश में तिजिया बाई द्वारा भूमि पर अपना कब्जा सिद्ध नहीं कर पाने का उल्लेख था। इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि बाद में संबंधित भूमि संतोष सोनी की किराना दुकान से जुड़े व्यक्ति के पक्ष में कथित रूप से बेची गई और वहां गोदाम बना लिया गया।

शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि संतोष सोनी के पास स्वयं की निजी पट्टे की भूमि होने के बावजूद कथित शासकीय भूमि का उपयोग किया जा रहा है। भूमि की खरीद-बिक्री में कुछ बिचौलियों और तहसील कार्यालय से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका होने का आरोप भी लगाया गया है।

इन आरोपों की पुष्टि के लिए तहसीलदार के मूल आदेश, खसरा-नक्शा, बी-1, भूमि के स्वामित्व संबंधी अभिलेख, कथित विक्रय दस्तावेज, नामांतरण की स्थिति और मौके पर बने गोदाम की जांच आवश्यक है।

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कथित बिक्री किस दस्तावेज के आधार पर हुई। क्या भूमि वास्तव में मध्य प्रदेश शासन के नाम दर्ज है? क्या किसी सक्षम अधिकारी ने उसका वैध आवंटन किया था? यदि नहीं, तो कथित विक्रय दस्तावेज तैयार होने और उस पर अमल होने की परिस्थितियों की जांच किसने की?

ध्यान देने योग्य बात: किसी व्यक्ति के नाम पर बिक्री दस्तावेज होना अपने आप में शासकीय भूमि पर वैध स्वामित्व सिद्ध नहीं करता। इसी प्रकार, केवल शिकायत के आधार पर किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। अंतिम निष्कर्ष राजस्व अभिलेखों, दस्तावेजों और सक्षम जांच के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

क्या सरकारी वेतन और मानदेय लेने वाले अधिकारियों की कोई जवाबदेही नहीं?

इस पूरे मामले में शहरी विकास विभाग, नगर परिषद, नजूल विभाग और राजस्व प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि वर्षों से लिखित शिकायतें दिए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जबकि कथित निर्माण, भूमि के उपयोग और बिक्री से जुड़े मामले लगातार सामने आते रहे।

यदि संबंधित अधिकारियों को सरकारी भूमि पर कथित कब्जे की जानकारी थी, तो उन्हें नियमानुसार निरीक्षण, अभिलेख सत्यापन और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रतिवेदन जैसी कार्रवाई करनी चाहिए थी। यदि कोई अधिकारी अपने दायित्व का निर्वहन करने में विफल रहा है, तो उसके कारणों और जिम्मेदारी की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

क्या अधिकारियों ने शिकायतों को गंभीरता से लिया? क्या किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर जांच की? क्या शासकीय भूमि को सुरक्षित रखने के लिए कोई आदेश जारी हुआ? क्या कथित अवैध निर्माण पर कार्रवाई प्रस्तावित की गई? इन सभी प्रश्नों का उत्तर संबंधित विभागों के आधिकारिक अभिलेखों से मिलना चाहिए।

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि संबंधित जानकारी पहले ही कलेक्टर कार्यालय को भेजी जा चुकी है। यदि ऐसा है, तो शिकायत प्राप्त होने की तारीख, उस पर की गई कार्रवाई और जांच की वर्तमान स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

दलालों की भूमिका और तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच जरूरी –

शिकायतकर्ता का आरोप है कि शासकीय भूमि की कथित खरीद-बिक्री में सक्रिय बिचौलियों की भूमिका रही है और कुछ लोग जमीन की खरीद-बिक्री कराने का काम करते हैं। इन आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति या अधिवक्ता को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि दस्तावेजों से अनियमितता के संकेत मिलते हैं, तो भूमि के कथित हस्तांतरण में शामिल सभी व्यक्तियों, दस्तावेज तैयार करने वालों और संबंधित कार्यालयों की भूमिका की जांच की जा सकती है।

कलेक्टर कार्यालय को यह देखना चाहिए कि कथित भूमि बिक्री में किस दस्तावेज का इस्तेमाल हुआ, दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया, नामांतरण या अन्य राजस्व प्रक्रिया अपनाई गई या नहीं, और किसी अधिकारी द्वारा पहले जारी किए गए आदेश को बाद में बदला या निरस्त किया गया तो उसके पीछे क्या वैधानिक आधार था।

शिकायतकर्ता के अनुसार, इन मामलों से संबंधित जानकारी पूर्व में कलेक्टर रत्नाकर झा को व्हाट्सऐप के माध्यम से भी भेजी गई थी। इस दावे की पुष्टि के लिए संदेशों की तारीख, प्राप्ति का प्रमाण और संबंधित कार्यालय की कार्रवाई का रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए।

 

निष्पक्ष जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और दोषियों पर कार्रवाई की मांग –

यह मामला केवल एक भवन या भूमि विवाद तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि शासकीय संपत्ति पर अवैध कब्जा, नियमों के विपरीत निर्माण, अनियमित विद्युत कनेक्शन या भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।

जिला प्रशासन को चाहिए कि वह राजस्व, नजूल, नगर परिषद और विद्युत विभाग के अधिकारियों से अलग-अलग तथ्यात्मक रिपोर्ट प्राप्त करे। आवश्यक होने पर संयुक्त स्थल निरीक्षण कराया जाए, भूमि की वर्तमान स्थिति का पंचनामा तैयार किया जाए और सभी संबंधित आदेशों तथा अभिलेखों का मिलान किया जाए।

शिकायतकर्ता की मांग है कि संबंधित भूमि की वैधानिक स्थिति स्पष्ट की जाए, कथित भवन निर्माण और किराये के उपयोग की जांच हो, पांच विद्युत कनेक्शनों से संबंधित आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए तथा भूमि की कथित खरीद-बिक्री में शामिल व्यक्तियों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच हो।

यदि शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा या अनियमित हस्तांतरण प्रमाणित होता है, तो नियमानुसार भूमि को सुरक्षित करने, अवैध निर्माण के संबंध में सक्षम प्राधिकारी से कार्रवाई कराने और दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध वैधानिक तथा विभागीय कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। क्या संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाई जाएगी, या शासकीय संपत्ति से जुड़े ये गंभीर सवाल अभिलेखों और जांच के बीच ही उलझे रहेंगे? प्रशासन की पारदर्शी कार्रवाई ही इन आरोपों की सच्चाई और जिम्मेदारों की भूमिका स्पष्ट कर सकती है।

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