भारी भ्रष्टाचार के चलते सिंचाई के स्रोत की जगह पिकनिक स्पॉट बना बसाढ़ जलाशय

उमरिया– उमरिया जिले के पाली विकासखण्ड अंतर्गत भिम्माडोंगरी पंचायत में ग्राम मरवाटोला के पास बसाढ़ नदी में जलसंसाधन विभाग द्वारा लगभग 10 करोड़ 88 लाख 76 हजार 822 रुपये की लागत से क्षेत्र के किसानों के लाभार्थ बनवाया गया बांधनिर्माण आरंभ होने के लगभग 14 वर्ष बाद भी कार्य पूर्ण न होने के कारण कृषकों के सिंचाई कार्य में काम न आकर पिकनिक स्पॉट बनकर रह गया है ।
चौदह वर्ष पूर्व शुरू हुआ था कार्य-
वर्ष 2012 में जलसंसाधन विभाग म.प्र. द्वारा ई टेन्डर क्रं 71 दिनांक 30/07/2012 (सिस्टम टेन्डर नं.2788) के माध्यम से बसाढ़ व्यपवर्तन योजना हेतु योजना का शीर्ष एवं नहर के कार्य के साथ समस्त प्रकार के स्ट्रक्चर के निर्माण कार्य की निविदा जारी की गई थी। यू.सी.एस.आर. (यूनिफाइड शेड्यूल ऑफ रेट्स )2009 के अनुसार जलसंसाधन विभाग द्वारा योजना हेतु 985.50 लाख रुपये की राशि का प्राकलन किया गया था। वित्तीय निविदा में निविदाकार मेसर्स सुशील दत्त पांडे प्राक्कलित राशि से 1.08 प्रतिशत राशि अधिक अर्थात नौ करोड़ छियानवे लाख तीन सौ चालीस रुपये राशि पर न्यूनतम निविदा के आधार पर चयनित हुए। संविदाकार मेसर्स सुशील दत्त पांडे और जल संसाधन विभाग के बीच हुए अनुबंध क्रं 09/2012-13 दिनांक 08/10/2012 की शर्तों में स्पष्ट उल्लेख है कि कार्य पूर्ण करने की अवधि 18 माह होगी जिसमें बारिश का मौसम भी शामिल है।
अनुबंध में संविदाकार को जारी वर्क ऑर्डर नंबर 5385/SAC/2012-13 उमरिया दिनांक 08/10/2012व अनुबंध दिनांक भी 08/10/2012 अंकित है जबकि रनिंग बिलों में अनुबंध की दिनांक 08/09/2012 अंकित है। रनिंग बिलों में कार्य आरंभ करने की तिथि भी 08/09/2012 दर्ज है। रनिंग बिलों में कार्य पूर्ण होने की वास्तविक तिथि 07/04/2014 अंकित है । तिथियों में विसंगतियाँ संदेह की स्थिति निर्मित करती हैं।
समय पर पूर्ण नहीं हुआ कार्य-
कार्यालय प्रमुख अभियंता जल संसाधन विभाग भोपाल के पत्र क्रं. -2788/271/ई-टेन्डेरिंग/2012-13 दिनांक 20/09/2012 में मेसर्स सुशील दत्त पांडे को बसाढ़ व्यपवर्तन योजना के निर्माण कार्य की सशर्त स्वीकृति प्रदान करते हुए यह लेख किया था कि योजना के निर्माण कार्य में समयावृद्धि नहीं दी जा सकेगी तथा मूल्यवृद्धि देय नहीं होगी।सूचना का अधिकार के तहत जल संसाधन विभाग के द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों से भी यह स्पष्ट नहीं होता है कि संबंधित संविदाकार को समयावृद्धि प्रदान की गई है ।
बसाढ़ व्यपवर्तन योजना का निर्माण कार्य अनुबंध के अनुसार 07/04/2014 तक पूर्ण हो जाना चाहिए था किन्तु विभागीय भ्रष्ट अधिकारियों और संविदाकार के गठजोड़ के चलते आज तक पूर्ण नहीं हो सका है । अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु जल संसाधन विभाग के तत्कालीन अधिकारियों नें संविदाकार के विरुद्ध कार्यवाही करने के स्थान पर निरंतर रनिंग बिलों का भुगतान किया । दिनांक 17/08/2017 को जारी 35 वें रनिंग बिल तक संविदाकार को कुल 10 करोड़ 88 लाख 76 हजार 822 रुपये की राशि का भुगतान किया जा चुका है ।अप्रैल 2014 में जिस योजना को पूर्ण हो जाना चाहिए था , उसके कार्यों हेतु मई 2017 तक जल संसाधन विभाग के अधीक्षण यंत्री ,उपयंत्री और अनुविभागीय अधिकारी साइट ऑर्डर बुक पर निर्देश देते नजर आते हैं ।
अनुबंध की राशि से अधिक का हुआ भुगतान-
जलसंसाधन विभाग उमरिया ने सूचना का अधिकार के तहत प्रदान की गई जानकारी में बताया कि बसाढ़ व्यपवर्तन योजना का कार्यपूर्णता प्रमाणपत्र उनके कार्यालय में उपलब्ध नहीं है,जिससे स्पष्ट होता है कि विभाग अपने अधिकारियों और संविदाकार के गठजोड़ द्वारा योजना में किए गए कालेपीले कारनामों पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहा है।
बसाढ़ व्यपवर्तन योजना स्थल का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि योजना का निर्माण कार्य आरंभ होने के लगभग 14 वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरांत भी बसाढ़ बांध का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है,जबकि जिस राशि पर संविदाकार नें बसाढ़ योजना का कार्य हासिल किया था,उससे लगभग एक करोड़ रुपये अधिक राशि का भुगतान संविदाकार को किया गया । प्रश्न यह उठता है कि बिना कार्य पूर्ण हुए अतिरिक्त धनराशि का भुगतान किस आधार पर और क्यों किया गया है ? जाहिर है योजना में अधिकारियों और ठेकेदार के गठजोड़ नें जमकर भ्रष्टाचार किया है। इसी जलाशय के कार्य की अनियमितताओं के चलते कार्य के तत्कालीन प्रभारी अधिकारी कमलाकर सिंह को निलंबित किया गया था।


नहीं मिल सका किसानों को योजना का लाभ-ग्रामीणों से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि बारिश में बांध का पानी बांध के ऊपर से बहता है जबकि बांध के दोनों गेटों में तकनीकी खराबी होने के कारण गर्मी के दिनों में बांध का सारा पानी रिसकर बह जाता है। बांध निचले स्थान पर बनाया गया है जबकि सिंचाई क्षेत्र ऊंचाई पर स्थित है । बांध की नहर बांध की ऊपरी दीवार से लगभग 10 से 15 फुट ऊंचाई पर बनाई गई हैं ,स्पष्ट है तकनीकी दृष्टि से बसाढ़ बांध से सिंचाई संभव ही नहीं है। नहरों का काम आज भी अधूरा है। ऐसा प्रतीत होता है कि बांध के सर्वे और ड्रॉइंग -डिजाइन तैयार करने का कार्य साइट का निरीक्षण करने के बजाय वातानुकूलित कमरों में बैठकर किया गया है। जलसंसाधन विभाग के अधिकारियों के निहित स्वार्थ की पराकाष्ठा का आलम यह है कि लगभग 11 करोड़ रुपये खर्च किए जाने के उपरांत भी बांध का कार्य अधूरा पड़ा है और भिम्माडोंगरी पंचायत के कृषकों को आज तक बांध के पानी से सिंचाई का लाभ नहीं मिल पाया है।
विभागीय उपेक्षा का शिकार जलाशय –
ऐसा प्रतीत होता है कि जल संसाधन विभाग बसाढ़ परियोजना को भूल सा गया है । मेंटेनेंस न होने के कारण बांध की दीवारें क्षतिग्रस्त हो रही हैं । ग्रामीणों के अनुसार बांध में विभाग का कोई चौकीदार भी तैनात नहीं है। बांध में स्कूली बच्चे अक्सर तफरीह करते और ग्रामीण बच्चे मछलियाँ नजर आते हैं । यदि ग्रामीणों की बात सच मानी जाए तो चौकीदार के न होने के कारण किसी अनहोनी घटना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। लगभग 11 करोड़ की राशि खर्च करके अधूरा बनाया गया बसाढ़ जलाशय विभागीय अधिकारियों के निहित स्वार्थ और लापरवाहीपूर्ण रवैये के कारण सिंचाई के साधन के स्थान पर पिकनिक स्पॉट बनकर रह गया है। जलसंसाधन विभाग के अधिकारियों नें किस कारण से और किसके वरदहस्त तले क्षेत्र के कृषकों के हितों को पलीता लगाने की छूट संविदाकार सुशील दत्त पांडे को दी ,यह जांच का विषय है।

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