भोपाल –
पं . विनोद गौतम ने बताया कि रक्षाबन्धन पर्व भारतीय धर्म संस्कृति के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बांधता है। भविष्योत्तर पुराण एवं मदनरत्न के अनुसार रक्षाबंधन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को होता है। इसमें अपरान्ह व्यापिनी तिथि ली जाती है अर्थात जिस दिन पूर्णिमा १८ घटी से २४ घटी तक या इससे अधिक समय तक व्याप्त रहे उस दिन रक्षाबंधन पर्व मनाना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति दो दिन हो तो पहले दिन रक्षाबंधन सूत्र बांधना चाहिए। याद रखें कि उस समय भद्राकाल नहीं होना चाहिए।
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
रक्षाबंधन के दिन श्रावणी पूर्णिमा को हर वर्ष बहनें अपने भाईयों की कलाई पर उसकी दीर्घायु, सुख-समृद्धि आदि की कामना से राखी बांधती हैं। अक्षत, पीली सरसों एवं सोने की तार आदि से विनिर्मित एक रक्षापोटली बहन अपने भाई को और पुरोहित अपने यजमान के हाथ में बांधते हैं। इसी दिन जगत की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी ने भी राजा बली के अनुरोध पर उसकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा था। इस पर्व पर भाई अपनी बहन को विविध उपहार प्रदान कर उसे खुश करते हैं। अपनी सगी बहन न हो तो मौसेरी, चचेरी ममेरी अथवा किसी धर्म बहन से रक्षाबंधन करवा सकते हैं।
रक्षा बंधन में राखी बांधते समय यह श्लोक बोला जाता है-
‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल-माचल:।।Ó
अर्थात् जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बली को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा। हे रक्षासूत्र तुम चलायमान न हो, आप अपने वचन से कभी विचलित न होना।
पौराणिक महत्व
रक्षाबंधन का त्योहार इंद्र और इंद्राणी की कथा से जुड़ा हुआ है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित है। रक्षाबंधन का त्योहार भगवान विष्णु और लक्ष्मी की कथा से भी जुड़ा हुआ है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित है। रक्षाबंधन के संबंध में हमें सबसे प्राचीन दो कथाएं मिलती हैं। पहली भविष्य पुराण में इंद्र और शची की कथा और दूसरी श्रीमद्भागवत पुराण में वामन और बली की कथा इस प्रकार है –
पहली कथा – भविष्य पुराण में कहीं पर लिखा है कि देव और असुरों में जब युद्ध शुरू हुआ, तब असुर या दैत्य देवों पर भारी पड़ने लगे। ऐसे में देवताओं को हारता देख इन्द्र घबराकर ऋषि बृहस्पति के पास गए। तब बृहस्पति के सुझाव पर इन्द्र की पत्नी इंद्राणी (शची) ने रेशम का एक धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। जिसके फलस्वरूप इंद्र विजयी हुए।
दूसरी कथा – हमें स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है। कथा के अनुसार असुरराज दानवीर राजा बली ने देवताओं से युद्ध करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था और ऐसे में उसका अहंकार चरम पर था। इसी अहंकार को चूर-चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन अवतार धारण किया और ब्राह्मण के वेश में राजा बली के द्वार भिक्षा मांगने पहुंच गए। चूंकि राज बली महान दानवीर थे तो उन्होंने वचन दे दिया कि आप जो भी मांगोगे मैं वह दूंगा। भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि की मांगी। बली ने तत्काल हां कर दी, क्योंकि तीन पग ही भूमि तो देना थी। लेकिन तब भगवान वामन ने अपना विशालरूप प्रकट किया और दो पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिया। फिर पूछा कि राजन अब बताइये कि तीसरा पग कहां रखूं? तब विष्णुभक्त राजा बली ने कहा, आप मेरे सिर पर रख लीजिए और फिर भगवान ने राजा बली को रसातल का राजा बनाकर अजर-अमर होने का वरदान दे दिया। लेकिन बली ने इस वरदान के साथ ही अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन भी ले लिया।
भगवान को वामनावतार के बाद पुन: लक्ष्मी के पास जाना था लेकिन भगवान ये वचन देकर फंस गए और वे वहीं रसातल में बली की सेवा में रहने लगे। उधर, इस बात से माता लक्ष्मी चिंतित हो गई। ऐसे में नारदजी ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। तब लक्ष्मीजी ने राजा बली को राखी बांध अपना भाई बनाया और अपने पति को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह रक्षा बंधन का त्योहार प्रचलन में हैं।
ऐतिहासिक महत्व
महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पाण्डव पुत्र युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूँ तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिये राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर संकट से मुक्ति पा सकते हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा कृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को राखी बाँधने के कई उल्लेख मिलते हैं।
महाभारत में ही रक्षाबन्धन से सम्बन्धित कृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तान्त भी मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार को चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबन्धन के पर्व में यहीं से प्रारम्भ हुई।

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